Translate

Tuesday 22 December 2015

संगति का असर


संगति का असर
कहा जाता है कि अच्छी संगति और अच्छे विचार
इंसान की प्रगति का द्वार खोल देते हैं । संगति
इंसान के जीवन में बहुत बड़ा महत्व रखती है , अगर आप
बुरी संगति में हों तो आप कितने भी बुद्धिमान क्यों
ना हों आप कभी भी जीवन में आगे नहीं बढ़ पाएंगे
और वहीँ अगर आप अच्छे लोगों की संगति में हैं तो
आपको बड़ी बड़ी समस्याएँ भी छोटी लगने लगेंगी ।
ऐसी ही एक सच्ची घटना आपके सामने प्रस्तुत है ,
आपको कहानी कैसी लगी हमें Comment के माध्यम
से जरूर बताएं –
अल्बर्ट आइंस्टीन, दुनिया के महान वैज्ञानिक
जिन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में अपना बहुत बड़ा
योगदान दिया है । एक बार आइंस्टीन Relativity
नामक Physics के टॉपिक पर रिसर्च कर रहे थे और
इसी के चक्कर में वो बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटीज और
कॉलेज में जाते थे और लोगों को लेक्चर देते थे ।
उनका ड्राइवर उनको बहुत बारीकी से देखा करता
था ।
एक दिन एक यूनिवर्सिटी में सेमिनार ख़त्म करके
आइंस्टीन घर लौट रहे थे , अचानक उनके ड्राइवर ने
कहा – सर जो आप Relativity पर यूनिवर्सिटी में
लेक्चर देते हो ये तो बहुत आसान काम है ये तो मैं भी
कर सकता हूँ । आइंस्टीन ने हँसते हुए कहा – ओके
,चिंता ना करो तुम्हें एक मौका जरूर दूंगा ।
फिर अगले दिन जब आइंस्टीन नई यूनिवर्सिटी में
लेक्चर देने गए तो उन्होंने अपने ड्राइवर को अपने कपडे
पहना दिए और खुद ड्राइवर के कपडे पहन लिए और
ड्राइवर से लेक्चर लेने को कहा । उस बिना पढ़े लिखे
ड्राइवर ने बिना किसी दिक्कत के बड़े बड़े प्रोफेसरों
के सामने लेक्चर दिया, किसी को पता ही नहीं
चला कि वो आइंस्टीन नहीं है । लेक्चर खत्म होते ही
एक प्रोफ़ेसर ने उस ड्राइवर से कुछ सवाल पूंछे तो इस
पर ड्राइवर ने कहा – इतना आसान सवाल, इसका
जवाब तो मेरा ड्राइवर ही दे देगा । ड्राइवर के रूप में
आइंस्टीन आगे आये और सारे सवालों का जवाब
दिया ।
बाद में आइंस्टीन ने सबको बताया कि लेक्चर देने
वाला शख्स आइंस्टीन नहीं आइंस्टीन का ड्राइवर है
तो वहां बैठे सभी प्रोफेसरों ने दातों तले उँगलियाँ
चबा लीं किसी को यकीन नहीं हुआ कि जो
Reletivity बड़े बड़े प्रोफेसरों को समझ नहीं आती इस
ड्राइवर ने उसे कितनी आसानी से दूसरों को
समझाया है ।
इसे कहते है संगति का असर , आइंस्टीन के साथ रहकर
एक बिना पढ़ा ड्राइवर भी इतना बुद्धिमान हो
गया । मित्रों अच्छे विचार और अच्छी संगति इंसान
में हिम्मत और सकारात्मकता का भाव लाती है ,
तो कोशिश करिये कि बुरे व्यसन, बुरी आदतों और
बुरी संगति से बचा जाये फिर उसके बाद जीवन बहुत
उज्जवल होने वाला ह

खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं Emotional Stories in Hindi


खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं Emotional Stories
in Hindi
मनीष बैंक में एक सरकारी अफसर था।
रोज बाइक से ऑफिस जाता और शाम को घर लौट के आता। शहर में
चकाचौंध तो बहुत रहती है लेकिन जीवन
कहीं सिकुड़ सा गया है, आत्मीयता
की भावना तो जैसे किसी में है
ही नहीं बस हर इंसान व्यस्त है खुद
की लाइफ में, यही सोचता हुआ
मनीष घर ऑफिस से घर की ओर जा रहा
था।
फुटपाथ पे एक छोटी सी डलिया लिए एक
बूढ़ी औरत बैठी थी, शायद
कुछ बेच रही थी। मनीष पास
गया तो देखा कि छोटी सी डलिया में वो
बूढ़ी औरत संतरे बेच रही
थी। देखो कैसा जमाना है लोग मॉल जाकर महँगा सामान
खरीदना पसंद करते हैं कोई इस बेचारी
की तरफ देख भी नहीं रहा,
मनीष मन ही मन ये बात सोच रहा था।
बाइक रोककर मनीष बुढ़िया के पास गया, बोला – अम्मा
1 किलो संतरे दे दो। बुढ़िया की आखों में उसे देखकर
एक चमक सी आई और तेजी से वो संतरे
तौलने लगी। पैसे देकर मनीष ने
थैली से एक संतरा निकाला और खाते हुए बोला – अम्मा
संतरे मीठे नहीं हैं और यह कहकर वो
एक संतरा उस बुढ़िया को दिया, वो संतरा चखकर बोली -
मीठा तो है बाबू। मनीष बिना कुछ बोले
थैली उठाये चलता बना।
अब ये रोज का क्रम हो गया, मनीष रोज उस बुढ़िया से
संतरे खरीदता और थैली से एक संतरा
निकालकर खाता और बोलता – अम्मा संतरे मीठे
नहीं हैं, और कहकर बचा संतरा अम्मा को देता,
बूढी संतरा खाकर बोलती -मीठा
तो है बाबू। बस फिर मनीष थैली लेकर चला
जाता। कई बार मनीष की
बीवी भी उसके साथ
होती थी वो ये सब देखकर बड़ा
आश्चर्यचकित होती थी। एक दिन उसने
मनीष से कहा – सुनो जी, ये सारे संतरे
रोज इतने अच्छे और मीठे होते हैं फिर
भी तुम क्यों रोज उस बेचारी के संतरों
की बुराई करते हो।
मनीष हल्की मुस्कान के साथ बोला – उस
बूढी माँ के सारे संतरे मीठे ही
होते हैं लेकिन वो बेचारी कभी खुद उन
संतरों को नहीं खाती। मैं तो बस ऐसा इसलिए
करता हूँ कि वो माँ मेरे संतरों में से एक खाले और उसका नुकसान
भी न हो।
उनके रोज का यही क्रम पास ही
सब्जी बेचती मालती
भी देखती थी। एक दिन वो
बूढी अम्मा से बोली- ये लड़का रोज संतरा
खरीदने में कितना चिकचिक करता है। रोज तुझे परेशान
करता है फिर भी मैं देखती हूँ कि तू उसको
एक संतरा फालतू तौलती है, क्यों? बूढ़ी
बोली – मालती, वो लड़का मेरे संतरों
की बुराई नहीं करता बल्कि मुझे रोज एक
संतरा खिलाता है और उसको लगता है कि जैसे मुझे पता
नहीं है लेकिन उसका प्यार देखकर खुद
ही एक संतरा उसकी थैली में
फालतू चला जाता है।
विश्वास कीजिये दोस्तों, कभी
कभी ऐसी छोटी
छोटी बातों में बहुत आनंद भरा होता है। खुशियाँ पैसे से
नहीं खरीदी जा
सकतीं, दूसरों के प्रति प्रेम और आदर की
भावना जीवन में मिठास घोल देती है। हाँ
एक बात और – “देने में जो सुख है वो पाने में नहीं”।
दोस्तों हमेशा याद रखना कि खुशियाँ बाँटने से बढ़ती हैं।

Sunday 20 December 2015

बुजुर्ग माता पिता


एक
बेटा अपने वृद्ध पिता को रात्रि भोज के लिए
एक
अच्छे रेस्टॉरेंट में लेकर गया।
खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने
कपड़ों
पर गिराया।
रेस्टॉरेंट में बैठे दुसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा
की नजरों से देख रहे थे लेकिन वृद्ध का बेटा शांत
था।
खाने के बाद बिना किसी शर्म के बेटा, वृद्ध को
वॉश रूम
ले गया। उसके कपड़े साफ़ किये, उसका चेहरा साफ़
किया,
उसके बालों में कंघी की,चश्मा पहनाया और फिर
बाहर
लाया।
सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे।बेटे ने बिल
पे
किया और वृद्ध के साथ
बाहर जाने लगा।
तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने बेटे को आवाज दी
और
उससे पूछा " क्या तुम्हे नहीं लगता कि यहाँ
अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो ?? "
बेटे ने जवाब दिया" नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़ कर
नहीं जा रहा। "
वृद्ध ने कहा " बेटे, तुम यहाँ
छोड़ कर जा रहे हो,
प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा (सबक) और प्रत्येक
पिता के लिए उम्मीद (आशा)। "
दोस्तो आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता
पिता
को अपने साथ बाहर ले जाना पसँद नही करते
और कहते है क्या करोगो आप से चला तो जाता
नही ठीक से खाया भी नही जाता आपतो घर पर
ही
रहो वही अच्छा होगा.
क्या आप भूल गये जब आप छोटे थे और आप के माता
पिता
आप को अपनी गोद मे उठा कर ले जाया
करते थे,
आप जब ठीक से खा नही
पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना
खिलाती थी
और खाना गिर जाने पर डाँट नही प्यार जताती
थी
फिर वही माँ बाप बुढापे मे बोझ क्यो लगने लगते
है???
माँ बाप भगवान का रूप होते है उनकी सेवा कीजिये
और
प्यार दीजिये...
क्योकि एक दिन आप भी बुढे होगे फिर अपने बच्चो
से
सेवा की उम्मीद मत करना.... —

Friday 18 December 2015

List of interesting facts you probably didn't know


Fact
: Every Apple iPhone ad displays the time as 9:41 AM, the time Steve Jobs unveiled it in 2007.
Fact: When the first prototype of Apple’s iPod was shown to Steve Jobs, he dropped it in an aquarium and used the air bubbles to prove there was empty space and it could be made smaller.
Fact: A marijuana-derived compound forces cancer cells to freeze and prevents them from spreading.
Fact: The ‘Wat Pa Maha Chedi Kaew’ Temple in Thailand was constructed with 1 million bottles of Heineken and a local beer.
Fact: Apple’s iPhone consumes US $0.25 worth of electricity per year if it’s fully charged once a day.
Fact: Rastafarians are legally allowed to possess marijuana in Italy due to it being a ‘Sacrament’ to the religion.
Fact: Rastafarians are legally allowed to possess marijuana in Italy due to it being a ‘Sacrament’ to the religion.
Fact: At 17 years old, Malala Yousafzai is the youngest recipient of the Nobel Peace Prize since its inception in 1901.
Fact: Women can fly airplanes in Saudi Arabia, but can’t drive cars.
Fact: Isaac Newton’s “Principia Mathematica” contained a simple calculation error that went unnoticed for 300 years.
Fact: According to the Guinness Book of World Records, India ranks third behind the USA and the UK in the number of records claimed each year.
Fact: Scientists have discovered that monkeys are susceptible to optical illusions, just like humans.
Fact: The Labrador dog is from Newfoundland and the Newfoundland dog is from Labrador.
Fact: Hours before his death, Einstein was still attempting to prove his Theory of Everything.
Fact: The word “Infant’ comes from the latin word “infans”, meaning  - unable to speak or speechless.
Fact: The term “ZIP” in “ZIP CODE” is an acronym for “Zone Improvement Plan.”
Fact: A single lego brick can take 432 kg (950 lbs) of pressure before it cracks.
Fact: On August 10, 2015, NASA astronauts ate food that had been grown in space for the first time.
Fact: Over 30 of Paul Walker’s cars were stolen from a warehouse within 24 hours of his tragic death.
Fact: The world record for most claps in one minute is 1,020.
Fact: If you die in Amsterdam without any friends or family left to attend your funeral, a poet will write a poem for you and recite it at your funeral.
Fact: Susan Wojcicki, the woman who rented her garage to Larry Page and Sergey Brin in 1998 when they were creating Google, later became the CEO of Youtube.
Fact: The last movie rented from Blockbuster before it closed its doors nationwide was ironically called “This is the End.”
Fact: Hundreds of prisoners were left to die in their cells during hurricane Katrina as officials abandoned Orleans Parish Prison.
Fact: Due to his internet popularity, the child from the “Success Kid” meme made enough money to fund his dad’s kidney transplant.
Fact: The poverty line in America was designed assuming every family had a housewife who was  a skilful cook.
Fact: Bananas have more trade regulations than AK-47s.
Fact: The longest plank (a form of exercise) ever was held for 5 hours and 15 minutes.
Fact: Sharks can see up to 10 times better than humans in clear water.
Fact: Snakes use their tongues to smell.
Fact: Anne Frank wrote most of her diary in the form of letters to a person named “Kitty”.
Fact: “Tinku” is a festival in Bolivia where people beat each other for 2 or 3 days straight.
Fact: “Alexithymia” is the inability of people to identify and describe their own emotions.
Fact: If we could jump proportionally as high as a locust, we would be able to jump 18m (59 ft).
Fact: A flock of starlings is called a “murmuration.”
Fact: Bubble wrap was originally designed as an easy-to-clean textured wallpaper.
Fact: 44% of the people who didn’t evacuate for hurricane Katrina stayed because they didn’t want to abandon their pets.
Fact: A baby is born on its predicted due date just 4% of the time.

Thursday 17 December 2015

आईंस्टीन के सुविचार


Albert Einstein Quotes in Hindi
आईंस्टीन के सुविचार
Albert Einstein
पहले आपको खेल के नियम अच्छे से जानने होंगे
तभी आप दूसरों से अच्छी तरह खेल
पाएंगे – Albert Einstein
अतीत से सीखो, वर्तमान में जियो, कल के
लिए आशा करो, कभी प्रश्न पूछना बंद मत करो ये
सबसे महत्वपूर्ण बात है – Albert Einstein
हम उसी सोच से समस्याओं को हल नहीं
कर सकते, जिस सोच से वो उत्पन्न हुई हैं – Albert
Einstein
भय से शांति नहीं लाई जा सकती। शांति तो
आपसी विश्वास आती है – Albert
Einstein
मैं कभी भविष्य के बारे में नहीं सोचता,
भविष्य तो बहुत जल्दी हमारे सामने होगा – Albert
Einstein
अनुभव ही ज्ञान का एकमात्र स्रोत है – Albert
Einstein
यह भयावह रूप से स्पष्ट हो चुका है कि हमारी
तकनीक हमारी मानवता की
सीमाएँ पार कर चुकी है – Albert
Einstein
अगर हम अपनी सीमाओं को जान लें तो
फिर हम अपनी सीमाओं से आगे निकल
सकते हैं – Albert Einstein
मूर्खता और बुद्धिमता में एक ही फर्क है कि
बुद्धिमता की एक सीमा होती
है – Albert Einstein
केवल दो चीजें अनंत हैं- ब्रह्माण्ड और मनुष्य
की मूर्खता; और मैं ब्रह्माण्ड के बारे में विश्वास से
नहीं कह सकता – Albert Einstein
तर्क(Logic) आपको A से B तक ले जा सकता है लेकिन
कल्पनाशक्ति आपको हर जगह लेजा सकती है –
Albert Einstein
जब आप एक अच्छी लड़की के साथ बैठे
हों तो एक घंटा एक सेकंड के सामान लगता है। जब आप धधकते
अंगारे पर बैठे हों तो एक सेकंड एक घंटे के सामान लगता है।
यही सापेक्षता है – Albert Einstein
आपके रवैये की कमजोरी, आपके चरित्र
कमजोरी बन जाती है – Albert
Einstein
प्रत्येक इंसान जीनियस है। लेकिन यदि आप
किसी मछली को उसकी पेड़
पर चढ़ने की योग्यता से जज करेंगे तो वो
अपनी पूरी ज़िन्दगी यह सोच
कर जिएगी कि वो मूर्ख है – Albert Einstein
जिस व्यक्ति ने कभी कोई गलती
नहीं की, मतलब उसने कभी
कुछ सीखने की कोशिश नहीं
की – Albert Einstein
जब तक कि आप कोशिश करना बन्द नहीं कर देते,
आप तब तक असफल नही हो सकते – Albert
Einstein
धर्म के बिना विज्ञान लंगड़ा है, विज्ञान के बिना धर्म अंधा है –
Albert Einstein
कल्पनाशक्ति, ज्ञान से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है
– Albert Einstein
दूसरों के लिए जिया जाने वाला जीवन ही
लाभप्रद है – Albert Einstein
मेरे अंदर कोई विशिष्ट प्रतिभा नहीं है, मैं बस
नयी चीज़ों को जानने के लिए उत्सुक रहता
हूँ – Albert Einstein

Wednesday 16 December 2015

सपने वे नही होते जो नींद में देखते हैं, सपने वो होते हैं जो नींद न आने दें”


बच्चों के करीब डॉ कलाम
भारत रत्न, महान विचारक, विद्वान, विज्ञानविद्
और उच्चकोटी के इंसान तथा भारत के राष्ट्रपति पद
को गरिमा देने वाले हम सबके प्यारे मिसाइल मैन,
डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को अक्सर आप सब ने बच्चों
के बीच मुस्कराते हुए देखा होगा। अपने कार्यकाल में
वो लाखों बच्चों से मिले । जब भी कलाम साहब
कहीं बाहर जाते, उनके कार्यक्रम में बच्चों से मिलने
का एक कार्यक्रम जरूर होता था। आज जब हम
सोचते हैं तो, बच्चों से घिरे कलाम साहब का एक
ऐसा चेहरा नजर आता है, जो स्वयं की मुस्कान संग
लाखों-करोड़ों बच्चो के लिये खुशियों का पैगाम हैं।
उनकी उपस्थिति बच्चों में एक नई उमंग का संचार कर
दिया करती थी और आज भी उन्हें प्रेरणा देती है।
कलाम साहब का मानना था कि बच्चे ऊर्जा के
अंनत स्रोत हैं। बच्चे प्रकृति से जुड़े होते हैं। अपनी
निश्छल आशाओं, विश्वास और कल्पनाओं के साथ
अंनत ऊर्जा का प्रवाह करते हैं। वे बच्चों की
प्राकृतिक ऊर्जा के रहस्य को भली-भाँति समझते
थे। कलाम साहब अपने बचपन की बात अपनी पुस्तक
अग्नी की उङान में लिखते
हैं-
“मै अपने पिता जी की उंगली पकड़कर घर से मस्जिद
की गली तक जाया करता था। मस्जिद में जब मेरे
पिता जी नमाज पढते तो मैं उन्हे देखा करता था।
मेरे मन में ये सवाल उठता था कि, पिता जी नमाज
क्यों पढते हैं? मस्जिद क्यों जाते हैं? नमाज पढने से
क्या होता है? और सब लोग नमाज क्यों नही पढते?
नमाज के बाद जब पिता जी मस्जिद के बाहर आते
तो लोग कटोरों में जल लिये उनकी ओर बढते थे। मेरे
पिता जी उस जल में अपनी उंगलियाँ डालते और फिर
कुछ मंत्र पढते और फिर कहते कि ले जाओ इसे मरीज
को अल्लाह का नाम लेकर पिला दो, वो ठीक हो
जायेगा। लोग वैसा ही करते तथा अगले दिन आकर
पिता जी का शुक्रिया अदा करते और कहते कि
खुदा की रहमत हो गई मरीज ठीक हो गया। मैं इतना
छोटा था कि इन सब बातों का अर्थ समझ नही
पाता था। किन्तु इतना जरूर लगता था कि जो भी
हो रहा है किसी अच्छे उद्देश्य के लिये हो रहा है।
जब मैं अपने पिता जी से प्रश्न करता था, तो वे बड़े
सहज और सरल भाव से मेरे हर प्रश्न का जवाब देते थे।”
कलाम साहब का कहना है कि-” बचपन में पिता जी
के साथ बिता वह पल मेरे लिये खास है और उनके साथ
बिते अनुभव की वजह से ही मैं आज बच्चों के उत्तर
सरलता से दे पाता हूँ।”
मित्रों, डॉ. कलाम साहब ने बच्चों के बीच बिताए
अनुभव के आधार पर अंग्रेजी में ignited minds
नामक एक पुस्तक लिखी,
जिसे तेजस्वी मन शीर्षक से हिंदी में प्रकाशित
किया गया। कलाम साहब ने एक महत्वपूर्ण फैसला
लेते हुए तय किया कि वे भारत की सच्ची तस्वीर को
यहाँ के बच्चों में तलाशेंगे। उनका मानना था कि
वैज्ञानिक कैरियर, पद एवं पुरस्कार सब कुछ बच्चों के
आगे गौण है। कलाम साहब सभी अभिभावकों को ये
संदेश देते कि, बच्चों की जिज्ञासा को एवं उनके
बाल सुलभ सरल एवं सहज प्रश्नों का उत्तर देने का हर
संभव प्रयास करना चाहिये। उनकी ये दिली ख्वाइश
रहती थी कि वे बच्चों के बीच जायें और उन्ही की
तरह सरल एवं सहज बनकर उनसे बात करें। न कोई
औपचारिकता हो और न कोई बंधन।
एकबार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि, आप इतने बड़े
वैज्ञानिक हैं तथा राष्ट्रपति जैसे गरिमावान पद पर
आसीन होते हुए बच्चों के लिये इतना समय कैसे
निकाल लेते हैं? ऐसा क्या मिलता है आपको उनसे?
कलाम साहब ने कहा कि, “बच्चों के स्तर पर उतर कर
मेरे मन में नई-नई उमंगे हिलोरे लेने लगती हैं। दुनिया का
कोई भी काम मुझे मुश्किल नही लगता। मेरे हौसले
आसमान छूने लगते हैं। बच्चों से बाते करके, उनकी
आँखों में आँखे डालकर उनके भावों के साथ एकाग्रता
स्थापित करते ही, तन मन में एक अद्भुत ऊर्जा का
संचार होने लगता है।”
विभिन्न जगहों पर बच्चों से मुलाकात के दौरान
बच्चे डॉ कलाम से प्रश्न पूछा करते थे। बच्चों द्वारा
पूछे गये कुछ प्रश्नो का जिक्र, हम आप सबसे करना
चाहेंगे।
कलाम साहब अक्सर कहते थे कि, ” सपने वे नही होते
जो नींद में देखते हैं, सपने वो होते हैं जो नींद न
आने दें”
इसी सपने की बात पर एकबार एक बच्चे ने कलाम
साहब से पूछा कि, “सर मैने आपकी अग्नी की उड़ान
पुस्तक पढी आप हमेशा सपने की बात क्यों करते हैं?”
कलाम साहब ने उत्तर देते हुए कहा कि, “पहले तुम तीन
बार स्वपन स्वपन स्वपन बोलो। तुम पाओगे कि स्वपन
ही विचार बनते हैं और विचार कर्म के रूप में बाहर
आते हैं। यदि स्वपन नही होंगे तो क्रान्तिकारी
विचार भी जन्म नही लेंगे। मित्रों, हम यहाँ कलाम
साहब की एक कविता का जिक्र करना चाहेंगे,
” स्वप्न स्वप्न स्वप्न
स्वप्नों में छुपा है सृजन
स्वप्नों में है मूर्त छवि
होते विचार हैं
जिनसे जन्मा कर्म
करता निर्माण है। “

short story थॉमस एल्वा एडिसन (inspirational story)


एक दिन थॉमस एल्वा एडिसन जो कि प्रायमरी स्कूल का विद्यार्थी था,
अपने घर आया और एक कागज अपनी माताजी को दिया और बताया:-
" मेरे शिक्षक ने इसे दिया है और कहा है कि इसे अपनी माताजी को ही देना..!"
उक्त कागज को देखकर माँ की आँखों में आँसू आ गये और वो जोर-जोर से पड़ीं,
जब एडीसन ने पूछा कि
"इसमें क्या लिखा है..?"
तो सुबकते हुए आँसू पोंछ कर बोलीं:-
इसमें लिखा है..
"आपका बच्चा जीनियस है हमारा स्कूल छोटे स्तर का है और शिक्षक बहुत प्रशिक्षित नहीं है,
इसे आप स्वयं शिक्षा दें ।
कई वर्षों के बाद उसकी माँ का स्वर्गवास हो गया।
थॉमस एल्वा एडिसन जग प्रसिद्ध वैज्ञानिक बन गये।
उसने कई महान अविष्कार किये,
एक दिन वह अपने पारिवारिक वस्तुओं को देख रहे थे।
आलमारी के एक कोने में उसने कागज का एक टुकड़ा पाया
उत्सुकतावश उसे खोलकर देखा और पढ़ने लगा।
वो वही काग़ज़ था..
उस काग़ज़ में लिखा था-
"आपका बच्चा बौद्धिक तौर पर कमजोर है और उसे अब और इस स्कूल में नहीं आना है।
एडिसन आवाक रह गये और घण्टों रोते रहे,
फिर अपनी डायरी में लिखा
***
एक महान माँ ने
बौद्धिक तौर पर कमजोर बच्चे को सदी का महान वैज्ञानिक बना दिया
***
यही सकारात्मकता और सकारात्मक पालक (माता-पिता) की शक्ति है ।।

डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल


डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल ( १३ दिसंबर, १९०१-२४
जुलाई, १९४४)
हिंदी में डी.लिट.
की उपाधि प्राप्त करने वाले पहले शोध
विद्यार्थी
डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल का जन्म तथा मृ्त्यु दोनो
ही पाली ग्राम( पौडी गढवाल)
,उत्तराखंड, भारत मे हुई. बाल्यकाल मे उन्होने "अंबर" नाम से
कविताये लिखी. फिर कहानिया व संपादन ( हिल्मैन
नामक अंग्रेजी पत्रिका) किया. डॉ० बड्थ्वाल ने
हिन्दी में शोध की परंपरा और
गंभीर अधय्यन को एक मजबूत आधार दिया. आचार्य
रामचंद्र शुक्ल और बाबू श्यामसुंदर दास जी के विचारो
को आगे बढाया और हिन्दी आलोचना को आधार दिया. वे
उत्तराखंड की ही नही भारत
की शान है जिन्हे देश विदेशो मे सम्मान मिला.
उत्तराखंड के लोक -साहित्य(गढवाल) के प्रति भी
उनका लगाव था.
डॉ० पीताम्बर दत्त बडथ्वाल स्वन्त्रत भारत के
प्रथम शोध छात्र है जिन्हे १९३३ के दीक्षांत समारोह
में डी.लिट(हिन्दी) से नवाज़ा गया उनके
शोध कार्य " हिन्दी काव्य मे निर्गुणवाद" ('द निर्गुण
स्कूल आफ हिंदी पोयट्री' -
अंग्रेजी शोध पर आधारित जो उन्होने श्री
श्यामप्रसाद जी के निर्देशन में किया था) के लिये.
उनका आध्यातमिक रचनाओ की तरफ लगाव था जो
उनके अध्यन व शोध कार्य मे झलकता है. उन्होंने संस्कृत,
अवधी, ब्रजभाषा, अरबी एवं
फारसी के शब्दो और बोली को
भी अपने कार्य मे प्रयोग किया. उन्होने संत, सिद्घ,
नाथ और भक्ति साहित्य की खोज और विश्लेषण में
अपनी रुचि दिखाई और अपने गूढ विचारो के साथ इन पर
प्रकाश डाला. भक्ति आन्दोलन (शुक्लजी
की मान्यता ) को हिन्दू जाति की निराशा का
परिणाम नहीं माना लेकिन उसे भक्ति धारा का विकास माना.
उनके शोध और लेख उनके गम्भीर अध्ययन और
उनकी दूर दृष्टि के भी परिचायक हैं.
उन्होने कहा था "भाषा फलती फूलती तो है
साहित्य में, अंकुरित होती है बोलचाल में, साधारण
बोलचाल पर बोली मँज-सुधरकर साहित्यिक भाषा बन
जाती है". वे दार्शनिक वयक्तित्व के धनी,
शोधकर्ता,निबंधकार व समीक्षक थे. उनके निबंध/
शोधकार्य को आज भी शोध विद्दार्थी
प्रयोग करते है. उनके निबंध का मूल भाव उसकी
भूमिका या शुरुआत में ही मिल जाता है.
निम्नलिखित कृ्तिया डॉ० बडथ्वाल की सोच, अध्यन व
शोध को दर्शाती है.
· रामानन्द की हिन्दी रचनाये
( वारानसी, विक्रम समवत २०१२)
· डॉ० बडथ्वाल के श्रेष्ठ निबंध (स. श्री गोबिंद
चातक)
· गोरखवाणी(कवि गोरखनाथ की रचनाओ का
संकलन व सम्पादन)
· सूरदास जीवन सामग्री
· मकरंद (स. डा. भगीरथ मिश्र)
· 'किंग आर्थर एंड नाइट्स आव द राउड टेबल' का
हिन्दी अनुवाद(बच्चो के लिये)
· 'कणेरीपाव'
· 'गंगाबाई'
· 'हिंदी साहित्य में उपासना का स्वरूप',
· 'कवि केशवदास'
· 'योग प्रवाह' (स. डा. सम्पूर्णानंद)
उनकी बहुत सी रचनाओ मे से कुछ एक
पुस्तके "वर्डकेट लाईब्रेरी" के पास सुरक्षित
है..हिन्दी साहित्य अकादमी अब
भी उनकी पुस्तके प्रकाशित
करती है. कबीर,रामानन्द और
गोरखवाणी (गोरखबानी, सं. डॉ०
पीतांबरदत्त बडथ्वाल, हिंदी साहित्य
संमेलन, प्रयाग, द्वि० सं०) पर डॉ० बडथ्वाल ने बहुत कार्य किया
और इसे बहुत से साहित्यकारो ने अपने लेखो में और शोध कार्यो में
शामिल किया और उनके कहे को पैमाना माना. यह अवश्य
ही चिंताजनक है कि सरकार और साहित्यकारो ने उनको
वो स्थान नही दिया जिसके वे हकदार थे. प्रयाग
विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर डा॰ रानाडे
भी कहा कि 'यह केवल हिंदी साहित्य
की विवेचना के लिये ही नहीं
अपितु रहस्यवाद की दार्शनिक व्याख्या के लिये
भी एक महत्त्वपूर्ण देन है.
"नाथ सिद्वो की रचनाये " मे ह्ज़ारीप्रसाद
द्विवेदी जी ने भूमिका मे लिखा है
" नाथ सिद्धों की हिन्दी रचनाओं का यह
संग्रह कई हस्तलिखित प्रतियों से संकलित हुआ है. इसमें
गोरखनाथ की रचनाएँ संकलित नहीं हुईं,
क्योंकि स्वर्गीय डॉ० पीतांबर दत्त
बड़थ्वाल ने गोरखनाथ की रचनाओं का संपादन पहले से
ही कर दिया है और वे ‘गोरख बानी’ नाम से
प्रकाशित भी हो चुकी हैं
(हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग). बड़थ्वाल
जी ने अपनी भूमिका में बताया था कि
उन्होंने अन्य नाथ सिद्धों की रचनाओं का संग्रह
भी कर लिया है, जो इस पुस्तक के दूसरे भाग में
प्रकाशित होगा. दूसरा भाग अभी तक प्रकाशित
नहीं हुआ है अत्यंत दुःख की बात है कि
उसके प्रकाशित होने के पूर्व ही विद्वान् संपादक ने
इहलोक त्याग दिया. डॉ० बड़थ्वाल की खोज में 40
पुस्तकों का पता चला था, जिन्हें गोरखनाथ-रचित बताया जाता है. डॉ०
बड़थ्वाल ने बहुत छानबीन के बाद इनमें प्रथम 14
ग्रंथों को निसंदिग्ध रूप से प्राचीन माना, क्योंकि इनका
उल्लेख प्रायः सभी प्रतियों में मिला.तेरहवीं
पुस्तक ‘ग्यान चौंतीसा’ समय पर न मिल सकने के
कारण उनके द्वारा संपादित संग्रह में नहीं आ
सकी, परंतु बाकी तेरह को गोरखनाथ
की रचनाएँ समझकर उस संग्रह में उन्होंने प्रकाशित
कर दिया है".

" गार्बेज ट्रक "(Inspirational story)


" गार्बेज ट्रक "(Inspirational story)
.
.
.
एक दिन एक व्यक्ति ऑटो से रेलवे स्टेशन जा रहा
था। ऑटो वाला बड़े आराम से ऑटो चला रहा था
कि अचानक ही एक कार पार्किंग से निकलकर तेज
गति से रोड़ पर आ गयी। ऑटो चालक ने तेजी से ब्रेक
लगाया, तब जाकर कार ऑटो से टकराते टकराते
बची।
कार चालक गुस्से में कार से निकला और ऑटो वाले
को बहुत ही भला बुरा कहने लगा जबकि यहाँ गलती
खुद कार- चालक की ही थी। ऑटो वाले ने कार
वाले की बातों पर न गुस्सा किया न ही कोई
प्रतिक्रिया की और बल्कि उल्टा मुस्कराते हुए आगे
बढ़ गया।
ऑटो में बैठे व्यक्ति को कार वाले की हरकत पर
गुस्सा आ रहा था और उसने ऑटो वाले से पूछा तुमने
उस कार वाले को बिना कुछ कहे ऐसे ही क्यों जाने
दिया। उसने तुम्हें कितना भला बुरा कहा जबकि
गलती तो उसकी खुद की थी। और ये तो हमारी
किस्मत अच्छी है, नहीं तो उसकी वजह से आज हम
अस्पताल में होते।
ऑटो वाले ने बड़ी शांती से उस व्यक्ति से कहा
साहब बहुत से लोग गार्बेज ट्रक (कूड़े का ट्रक) की
तरह होते है। वे बहुत सारा कूड़ा-करकट अपने दिमाग में
भरे हुए चलते है, हमेशा निराशा, क्रोध और चिंता से
भरे हुए नकारात्मक रवैया अपनाते है। और जब जब उनके
दिमाग में निराशा रूपी कूड़ा बहुत अधिक हो
जाता है तो वे अपना बोझ हल्का करने के लिए इसे
दूसरों पर फेंकने का मौका ढूँढ़ने ही लगते है, और जैसे
ही मौका मिलता ही तुरंत कूड़ा दूसरे पर फेंकने लगते है

इसलिए मैं हमेशा ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ और
उन्हें दूर से ही मुस्कराकर अलविदा कह देता हूँ
क्योंकि अगर उन जैसे लोगों द्वारा गिराया हुआ
कूड़ा अगर मैंने स्वीकार कर लिया तो एक दिन मैं
भी एक गार्बेज ट्रक बन ही जाऊँगा और अपने साथ-
साथ आसपास के लोगों पर भी निराशा रूपी कूड़ा
गिराता रहूँगा। तो इससे बेहतर यही हे की में उस और
ध्यान ही ना दूँ ।
जिंदगी बहुत छोटी है इसलिए जो कोई भी हमसे
अच्छा व्यवहार करते है उन्हें सादर धन्यवाद कहो और
जो भी हमसे अच्छा व्यवहार नहीं करते, उन्हें हमेशा
मुस्कुराकर माफ़ कर दो। तो देखिये आपकी जिंदगी
हमेशा खुशनुमा बनी रहेगी ।

Tuesday 15 December 2015

बछेंद्री पाल


बछेंद्री पाल
जन्म
24 मई 1954 (आयु 61 वर्ष)
नकुरी उत्तरकाशी , उत्तराखंड
राष्ट्रीयता
भारतीय
व्यवसाय
इस्पात कंपनी 'टाटा स्टील' में कार्यरत,
जहाँ चुने हुए लोगो को रोमांचक अभियानों का प्रशिक्षण
देती हैं।
बछेंद्री पाल (जन्म: 24 मई 1954) माउंट एवरेस्ट
पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला हैं।
वे एवरेस्ट की ऊंचाई को छूने वाली दुनिया
की 5वीं महिला पर्वतारोही हैं।
वर्तमान में वे इस्पात कंपनी टाटा स्टील में
कार्यरत हैं, जहां वह चुने हुए लोगो को रोमांचक अभियानों का
प्रशिक्षण देती हैं। [1]
प्रारंभिक जीवन
बछेंद्री पाल का जन्म उत्तराखंड राज्य के
उत्तरकाशी जिले के एक गाँव नकुरी में सन्
1954 को हुआ। खेतिहर परिवार में जन्मी
बछेंद्री ने बी.एड. तक की
पढ़ाई पूरी की। मेधावी और
प्रतिभाशाली होने के बावजूद उन्हें कोई अच्छा रोज़गार
नहीं मिला। जो मिला वह अस्थायी, जूनियर
स्तर का था और वेतन भी बहुत कम था। इस से
बछेंद्री को निराशा हुई और उन्होंने नौकरी
करने के बजाय 'नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग'
कोर्स के लिये आवेदन कर दिया। यहाँ से बछेंद्री के
जीवन को नई राह मिली। 1982 में एडवांस
कैम्प के तौर पर उन्होंने गंगोत्री (6,672
मीटर) और रूदुगैरा (5,819) की चढ़ाई को
पूरा किया। इस कैम्प में बछेंद्री को ब्रिगेडियर ज्ञान
सिंह ने बतौर इंस्ट्रक्टर पहली नौकरी
दी। हालांकि पेशेवर पर्वतारोही का पेशा
अपनाने की वजह से उन्हे परिवार और रिश्तेदारों के
विरोध का सामना भी करना पड़ा। [2][3]
करियर
बछेंद्री के लिए पर्वतारोहण का पहला मौक़ा 12 साल
की उम्र में आया, जब उन्होंने अपने स्कूल
की सहपाठियों के साथ 400 मीटर
की चढ़ाई की। 1984 में भारत का चौथा
एवरेस्ट अभियान शुरू हुआ। इस अभियान में जो टीम
बनी, उस में बछेंद्री समेत 7 महिलाओं
और 11 पुरुषों को शामिल किया गया था। इस टीम के
द्वारा 23 मई 1984 को अपराह्न 1 बजकर सात मिनट पर
29,028 फुट (8,848 मीटर) की ऊंचाई
पर 'सागरमाथा (एवरेस्ट)' पर भारत का झंडा लहराया गया। इस के
साथ एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक क़दम रखने वाले वे दुनिया
की 5वीं महिला बनीं।
भारतीय अभियान दल के सदस्य के रूप में माउंट
एवरेस्ट पर आरोहण के कुछ ही समय बाद उन्होंने
इस शिखर पर महिलाओं की एक टीम के
अभियान का सफल नेतृत्व किया। उन्होने 1994 में गंगा
नदी में हरिद्वार से कलकत्ता तक 2,500
किमी लंबे नौका अभियान का नेतृत्व किया। हिमालय के
गलियारे में भूटान , नेपाल, लेह और सियाचिन ग्लेशियर से होते हुए
काराकोरम पर्वत शृंखला पर समाप्त होने वाला 4,000
किमी लंबा अभियान उनके द्वारा पूरा किया गया, जिसे इस
दुर्गम क्षेत्र में प्रथम महिला अभियान का प्रयास कहा जाता है।
[4][5][6]
सम्मान/पुरस्कार
भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन से पर्वतारोहण में
उत्कृष्टता के लिए स्वर्ण पदक (1984) [7]
पद्मश्री (1984) से सम्मानित।[8]
उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा स्वर्ण पदक
(1985)।
अर्जुन पुरस्कार (1986) भारत सरकार द्वारा।
कोलकाता लेडीज स्टडी ग्रुप अवार्ड
(1986)।
गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (1990) में
सूचीबद्ध।
नेशनल एडवेंचर अवार्ड भारत सरकार के द्वारा (1994)।
उत्तर प्रदेश सरकार का यश भारती सम्मान
(1995)।
हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से
पी एचडी की मानद उपाधि
(1997)।
संस्कृति मंत्रालय, मध्य प्रदेश सरकार की पहला
वीरांगना लक्ष्मीबाई
राष्ट्रीय सम्मान (2013-14)

सुमित्रानंदन पंत


सुमित्रानंदन पंत
(२० मई १९०० - २८ दिसम्बर १९७७) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध छायावादी कवियों का उत्थान काल था। सुमित्रानंदन पंत उस नये युग के प्रवर्तक के रूप में हिन्दी साहित्य में उदित हुए। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे छायावादी प्रकृति उपासक-सौन्दर्य पूजक कवियों का युग कहा जाता है। सुमित्रानंदन पंत का प्रकृति चित्रण इन सबमें श्रेष्ठ था। उनका जन्म ही बर्फ़ से आच्छादित पर्वतों की अत्यंत आकर्षक घाटी अल्मोड़ा में हुआ था, जिसका प्राकृतिक सौन्दर्य उनकी आत्मा में आत्मसात हो चुका था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।[1]

जीवन परिचय


पंत का जन्म अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में २० मई १९०० ई. को हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही उनकी माँ का निधन हो गया। उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया। उनका प्रारंभिक नाम गुसाई दत्त रखा गया।[2]वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण कर वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नया नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने बारवीं में प्रवेश लिया। १९२१ में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का अध्ययन करने लगे।इलाहाबाद में वे कचहरी के पास प्रकृति सौंदर्य से सजे हुए एक सरकारी बंगले में रहते थे। उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी कार्य किया। उन्हें मधुमेह हो गया था। उनकी मृत्यु २८ दिसम्बर १९७७ को हुई।

साहित्य सृजन


सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था। १९१८ के आसपास तक वे हिंदी के नवीन धारा के प्रवर्तक कवि के रूप में पहचाने जाने लगे थे। इस दौर की उनकी कविताएं वीणा में संकलित हैं। १९२६-२७ में उनका प्रसिद्ध काव्य संकलन ‘पल्लव’ प्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये। इसी दौरान वे मार्क्स व फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आये। १९३८ में उन्होंने ‘रूपाभ” नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। वे १९५५ से १९६२ तक आकाशवाणी से जुडे रहे और मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया। उनकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की उनकी रचनाओं में देखी जा सकती है। “वीणा” तथा “पल्लव” में संकलित उनके छोटे गीत विराट व्यापक सौंदर्य तथा पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं। “युगांत” की रचनाओं के लेखन तक वे प्रगतिशील विचारधारा से जुडे प्रतीत होते हैं। “युगांत” से “ग्राम्या” तक उनकी काव्ययात्रा प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है। उनकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुख पडाव हैं – प्रथम में वे छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से प्रेरित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी।[3]१९०७ से १९१८ के काल को स्वयं उन्होंने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं - ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी २८ पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं 'पल्लव' में संकलित हैं, जो १९१८ से १९२५ तक लिखी गई ३२ कविताओं का संग्रह है।


पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त


पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त या जी॰बी॰ पन्त
(जन्म १० सितम्बर १८८७ - ७ मार्च १९६१) प्रसिद्ध
स्वतन्त्रता सेनानी और वरिष्ठ भारतीय राजनेता थे।
वे उत्तर प्रदेश राज्य के प्रथम मुख्य मन्त्री और भारत
के चौथे गृहमंत्री थे। [2] सन १९५५ में उन्हें भारतरत्न से
सम्मानित किया गया। गृहमंत्री के रूप में उनका मुख्य
योगदान भारत को भाषा के अनुसार राज्यों में
विभक्त करना तथा हिन्दी को भारत की
राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना था। [3]
प्रारम्भिक जीवन
इनका जन्म १० सितम्बर १८८७ को अल्मोड़ा जिले के
श्यामली पर्वतीय क्षेत्र स्थित गाँव खूंट में
महाराष्ट्रीय मूल के एक कऱ्हाड़े ब्राह्मण कुटुंब में
हुआ। इनकी माँ का नाम गोविन्दी बाई और पिता
का नाम मनोरथ पन्त था। बचपन में ही पिता की
मृत्यु हो जाने के कारण उनकी परवरिश उनके दादा
बद्री दत्त जोशी ने की। १९०५ में उन्होंने अल्मोड़ा
छोड़ दिया और इलाहाबाद चले गये। म्योर सेन्ट्रल
कॉलेज में वे गणित, साहित्य और राजनीति विषयों
के अच्छे विद्यार्थियों में सबसे तेज थे। अध्ययन के
साथ-साथ वे कांग्रेस के स्वयंसेवक का कार्य भी करते
थे। १९०७ में बी०ए० और १९०९ में कानून की डिग्री
सर्वोच्च अंकों के साथ हासिल की। इसके उपलक्ष्य
में उन्हें कॉलेज की ओर से "लैम्सडेन अवार्ड" दिया
गया।
१९१० में उन्होंने अल्मोड़ा आकर वकालत शूरू कर दी।
वकालत के सिलसिले में वे पहले रानीखेत गये फिर
काशीपुर में जाकर प्रेम सभा नाम से एक संस्था का
गठन किया जिसका उद्देश्य शिक्षा और साहित्य
के प्रति जनता में जागरुकता उत्पन्न करना था। इस
संस्था का कार्य इतना व्यापक था कि ब्रिटिश
स्कूलों ने काशीपुर से अपना बोरिया बिस्तर बाँधने
में ही खैरियत समझी।
स्वतन्त्रता संघर्ष में
दिसम्बर १९२१ में वे गान्धी जी के आह्वान पर
असहयोग आन्दोलन के रास्ते खुली राजनीति में उतर
आये।
९ अगस्त १९२५ को काकोरी काण्ड करके उत्तर प्रदेश
के कुछ नवयुवकों ने सरकारी खजाना लूट लिया तो
उनके मुकदमें की पैरवी के लिये अन्य वकीलों के साथ
पन्त जी ने जी-जान से सहयोग किया। उस समय वे
नैनीताल से स्वराज पार्टी के टिकट पर लेजिस्लेटिव
कौन्सिल के सदस्य भी थे। १९२७ में राम प्रसाद
'बिस्मिल' व उनके तीन अन्य साथियों को फाँसी के
फन्दे से बचाने के लिये उन्होंने पण्डित मदन मोहन
मालवीय के साथ वायसराय को पत्र भी लिखा
किन्तु गान्धी जी का समर्थन न मिल पाने से वे उस
मिशन में कामयाब न हो सके। १९२८ के साइमन
कमीशन के बहिष्कार और १९३० के नमक सत्याग्रह में
भी उन्होंने भाग लिया और मई १९३० में देहरादून जेल
की हवा भी खायी।
मुख्यमन्त्री कार्यकाल
१७ जुलाई १९३७ से लेकर २ नवम्बर १९३९ तक वे ब्रिटिश
भारत में संयुक्त प्रान्त अथवा यू०पी० के पहले मुख्य
मन्त्री बने। इसके बाद दोबारा उन्हें यही दायित्व
फिर सौंपा गया और वे १ अप्रैल १९४६ से १५ अगस्त
१९४७ तक संयुक्त प्रान्त (यू०पी०) के मुख्य मन्त्री रहे।
जब भारतवर्ष का अपना संविधान बन गया और
संयुक्त प्रान्त का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रखा गया
तो फिर से तीसरी बार उन्हें ही इस पद के लिये सर्व
सम्मति से उपयुक्त पाया गया। इस प्रकार स्वतन्त्र
भारत के नवनामित राज्य के भी वे २६ जनवरी १९५०
से लेकर २७ दिसम्बर १९५४ तक मुख्य मन्त्री रहे।
गृह मंत्री कार्यकाल
सरदार पटेल की मृत्यु के बाद उन्हें गृह मंत्रालय, भारत
सरकार के प्रमुख का दायित्व दिया गया। भारत के
रूप में पन्तजी का कार्यकाल:१९५५ से लेकर १९६१ में
उनकी मृत्यु होने तक रहा।
आलोचनाएें
मृत्यु
७ मई १९६१ को हृदयाघात से जूझते हुए उनकी मृत्यु हो
गयी। उस समय वे भारत सरकार में केन्द्रीय गृह मन्त्री
थे। उनके निधन के पश्चात लाल बहादुर शास्त्री उनके
उत्तराधिकारी बने।
स्मारक और संस्थान
गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिक
विश्वविद्यालय
, पंतनगर , उत्तराखण्ड
गोविन्द बल्लभ पन्त अभियान्त्रिकी
महाविद्यालय
, पौड़ी गढ़वाल , उत्तराखण्ड
गोविन्द बल्लभ पंत सागर , सोनभद्र , उत्तर प्रदेश

Exclusive Interview With Gajendra Singh Rana


Exclusive Interview With Gajendra Singh
Rana
Date of Birth: 4th July 1979
Interview By: Vinay Dobhal | Editor:
Namrata Naithani | Posted on 2nd October
2010
Tell us about yourself?
I was born in Delhi but my village is Gend which
comes under Nagri region of Chamba, Tehri
District. I studied till fourth standard in a village
school. That time my father was posted in
Dalmia, Delhi. So they called me there and I did
rest of my schooling from Senior Sec. School,
Malviyanagar and Graduation from Aurobindo
College, Delhi. I stayed in Delhi for 21 years and
now I am settled in Dehradun.
We are five brothers and sisters. Eldest one is
brother who works in Modi. After him there are
three sisters, all well settled with their families. I
am the youngest child of the family. I got
married in the year 2005. My wife Beena is a
housewife and we got blessed with a girl child 4
years back. My daughter's name is Shivangi.
Even though I passed maximum time in Delhi but
still I am so much attached to Uttarakhand.
During vacations I use to visit my village as my
mother was living there. In school I was a regular
participant in school's skits and dramas. My
friends use to enjoy it and they told me that I
must try in music. So in true sense they are the
ones who encouraged me to continue with
singing. My parents and family members too
were always supportive.
When you started singing professionally?
I started singing as a professional singer in the
year 1998. My very first album was Meru Gaun
Ku Baatu after which Teri Dwi Aankhyun Maa,
Yaad Teru Goun Ki and one more music album
came in the market.
Although my first music album didn't do well in
the market but gave hope to the Music
Companies about my credibility and talent. This
way I started getting new assignment and
haven't stopped since.
Tell us about your struggle in life.
My childhood time was not so easy and joyful. I
was in class 4th when I left my mother and came
to Delhi to stay with my father and elder brother.
That time we were living in a rented house. My
father was/is working in Dalmia. In his absence
we both brothers use to take care of the house.
We use to cook for ourselves, used to shop for
vegetables and other household items.
I was not so good in studies and was bit
confused about my future. It's all due to
blessings of God that I got Music line but
struggle was waiting for me there also.
When I started with my music career my first 4
music albums although were liked by people but
unfortunately didn't do well in the market. I got
nothing from those albums except failure. At that
moment of time I was so depressed and
hopeless that I thought of leaving Music Industry.
But God was planning something great for me.
So I gave my last try in VHR, one company
owned by Dangwal ji. Finally that last try came
as a supper hit, Leela Ghasyari!
After Leela Ghasyari my other albums like Raani
Ghursyaani, Sushma and Maalu came which
made my position strong in this field. Few days
later I got proposal directly from T-Series
Company to sing for them and till now I am
singing for that Company only.
Still my mother stays in village and takes care of
our house and fields. I have shifted to
Clementon, Dehradun where I live with my wife
and daughter.
Which are your super hits albums?
My super hits albums are Leela Ghasyari, Raani
Ghursyaani, Sushma, Maalu, Pushpa, Raajmati.
After this came another super hit, Hima
Marchwan of which one song Babli Tero Mobile
was very much liked by young generation.
Another hits were Gabru Dida, Furki Baand,
Baand Bhanumati and Chakna Baand.
Till now you have sung for how many music
albums?
I really don't remember the count.
Till now you have been honoured with which all
awards?
I have been honoured lot many times during
events organised by Private Organisations and
Groups but never been honoured by our State
Government. It is sad that our State Government
never organise such events where folk singers or
regional movies are awarded.

Monday 14 December 2015

नरेन्द्र सिंह नेगी जी




               Narender singh Negi
उत्तराखण्ड के
गढवाल हिस्से के मशहूर लोक गीतकारों में से एक है।
कहा जाता है कि अगर आप उत्तराखण्ड और वहाँ के
लोग, समाज, जीवनशैली, संस्कृति, राजनीति, आदि
के बारे में जानना चाहते हो तो, या तो आप किसी
महान-विद्वान की पुस्तक पढ लो या फिर नरेन्द्र
सिंह नेगी जी के गाने/गीत सुन लो। उनकी श्री नेगी
नामक संस्था उत्तराखण्ड कलाकारो के लिए एक
लोकप्रिय संस्थाओं मे से एक है। नेगी जी सिर्फ एक
मनोरंजन-कार ही नहीं बल्कि एक कलाकार,
संगीतकार और कवि है जो कि अपने परिवेश को लेकर
काफी भावुक व संवेदनशील है।
बैकग्राउंड (पृष्ठभूमि)
नेगी जी का जन्म १२ अगस्त १९४९ को पौड़ी जिले
के पौड़ी गाँव (उत्तराखण्ड) में हुआ। उन्होंने अपने
जीवन-वृती (कॅरियर) की शुरुआत पौड़ी से की थी
और अब तक वे दुनिया भर के कई बडे बडे देशों मे गा
चुके हैं।[1] गढवाल (उत्तराखण्ड) के इस मशहूर गायक के
गानों मे मात्रा (क्वांटिटी) की बजाय गुणवत्ता/
योग्यता (क्वालिटी) होने के कारण ही लोग उनके
गानों को बहुत पसंद करते हैं। समय के साथ-साथ
" गढवाल म्यूजिक इंडस्ट्री" में नये गायक भी शामिल
हुए। लेकिन नए गायकों की नई आवाज के होते हुए
भी पूरा उत्तराखण्ड उनके गानों को वही प्यार और
सम्मान के साथ आज भी सुनता है। नेगी जी के
गानों में अहम बात है उनके गानों के बोल (लिरिक्स)
और उत्तराखण्ड के लोगों के प्रति भावनाओं की
गहरी धारा। उन्होंने अपने गीतों के बोल और आवाज
के माध्यम से उत्तराखण्डी लोगों के सभी दुख-दर्द,
खुशी, जीवन के पहलूओं को दर्शाया है। किसी भी
लोकगीत की भावनाओं और मान-सम्मान को बिना
ठेस पहुँचाते हुए उन्होंने हर तरह के उत्तराखण्डी लोक
गीत गाएँ हैं।
नेगी जी निवासी गायकों के साथ साथ गैर-
निवासी गायकों में से एक मशहूर गायक हैं।
उत्तराखण्ड को अपने लोकगीत संग्रह में नेगी जी के
हर एक हिट गानों के साथ साथ बहुत सारे समर्थक
भी संग्रह करने के लिए मिले हैं। [2] उनके
प्रभावशाली गीतों के लिए उन्हें कई बार पुरस्कारों
से सम्मानित किया जा चुका है।
संगीत कार्य(कॅरियर)
नेगी जी ने अपने म्यूजिक कॅरियर (जीवन-वृती) की
शुरुआत गढवाली गीतमाला से की थी और यह
"गढवाली गीतमाला" १० अलग-अलग हिस्सों/पार्ट्स
में थी। जैसे कि यह गढवाली गीतमाला अलग अलग
कंपनियो से थी जिसके कारण नेगी जी को थोडी
सी दिक्कतों का सामना करना पडा। तो उन्होंने
अपनी कॅसेट्टस को अलग नाम से प्रदर्शित (रिलीज)
करना शुरू किया। उन्होंने पहली अॅल्बम का नाम
(शीर्षक) रखा बुराँस जो कि पहाड़ों में पाया जाने
वाला एक जाना माना एवं सुंदर सा फूल है। image =
jpeg नेगी जी ने अब तक सबसे ज्यादा गढवाली
सुपरहिट अॅल्बमस् रिलीज की हैं। उन्होंने कई गढवाली
फिल्मों में भी अपनी आवाज दी है जैसे कि
"चक्रचाल", "घरजवाई", "मेरी गंगा होलि त मैमा
आलि" आदि। अब तक नेगी जी ' १००० से भी अधिक
गाने गा चुके हैं। दुनिया भर में उन्हें कई बार अलग अलग
अवसरों पर पुरस्कार से नवाजा गया है। बडे समय के
बाद आकाशवाणी , लखनऊ ने नेगी जी को १० अन्य
कलाकारों के साथ अत्यधिक लोकप्रिय लोक
गीतकार ( Most Popular Folk Singers) की
मान्यता दी है और पुरस्कार से सम्मानित किया
गया। यह पुरस्कार फरमाइश-ए-गीत ]] (अंग्रेजी
अनुवाद: Songs on Demand) के लिए आकाशवाणी
को लोगों द्वारा भेजे गए प्राप्त मेल्स् (mails) की
संख्याओं पर आधारित था। अब तक नेगी जी कई
देशों में भी गाया हैं जैसे कि यु°एस°ए (USA),
ऑस्टेलिया (Australia), कॅनॅडा (Canada), न्यूजीलैंड
(New Zealand), मसकॅट (Muscat), ओमान (Oman),
बहरीन (Bahrain) और यु°ए°इ° (U.A.E.) आदि।
गढवाली-कुमाऊंनी एन°आर°आई ( Garhwali &
Kumaoni NRIs) द्वारा संचालित किया जाने
वाला "गढवाली और कुमाऊंनी समाज" उन्हें
अक्सर विदेशों में गाने के लिए आमंत्रित करते ही
रहते हैं। भारत और विदेशों में रहने वाले लोग नेगी
जी के गानों को बहुत पसंद करते हैं।
" ये आप सभी का प्यार ही है जो मैं अभी भी गा
पा रहा हूँ "- नरेन्द्र सिंह नेगी।
नेगी जी केवल वास्तविकता में विश्वास रखते हैं।
इसीलिए उनके सभी गाने वास्तविकता पर आधारित
होते हैं और इसी कारण नेगी जी उत्तराखण्ड के
लोगों के दिल के बहुत करीब है। गढवाली गायक होने
के बावजूद नेगी जी को कुमाऊंनी लोग भी उन्हें बहुत
पसंद करते हैं। हालाँकि कुमाऊंनी लोगो को
गढवाली पूरी तरह से समझ नहीं आती है फिर भी
सभी कुमाऊंनी लोग नेगी जी के गानों को बहुत
पसंद करते हैं। नेगी जी " गुलजार साहब " के काम को
बहुत पसंद करते हैं क्योंकि गुलजार की पुराने व नए
रचनाओं में एक गहरा अर्थ होता है। गाना गाने के
साथ ही नेगी जी लिखते भी हैं।
अब तक नेगी जी की 3 पुस्तके प्रकाशित
(publish) हो चुकी हैं।

नरेन्द्र मोदी : अद्भुत व्यक्तित्व


नरेन्द्र मोदी : अद्भुत व्यक्तित्व

नाम – नरेन्द्र दामोदरदास मोदी| जन्म – 17 सितम्बर 1950| वर्तमान में सबसे चर्चित व्यक्ति| नरेन्द्र मोदी वाकई में एक लीडर है और उनके सामने सारी मुसीबतें कमजोर पड़ जाती है| यह उनका व्यक्तित्व ही है जिसके कारण आज वह भारत के प्रधानमंत्री (Prime Minister ) है और विश्व की निगाहें उन पर टिकी हुयी है| नरेन्द्र मोदी भारत के ज्यादातर व्यक्तियों के आदर्श बन गए है और उनके व्यक्तित्व की खूबियों का परिक्षण करके हम भी अपने व्यक्तित्व को उत्तम बना सकते है क्योंकि यह हमारा व्यक्तित्व एंव चरित्र ही होता है जो हमें सफल बनाता है|

तो आईये जानते है कि क्या है नरेन्द्र मोदी की सफलता का राज़:-



Success Mantra of Narendra Modi



मेहनत (Hardwork):-

नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) की सफलता का सबसे बड़ा राज यही है कि वह बहुत ज्यादा मेहनत करते है| चुनाव के समय वह केवल 3-4 घंटे ही सोते थे एंव प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वह 18 घंटे कार्य करते है| मेहनत से व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है एंव सफलता के सारे रास्ते खुल जाते है| यह मोदी की मेहनत ही है जिसके कारण एक चाय बेचने वाला आज भारत का प्रधानमंत्री है|

आत्मविश्वास (self-confidence):-

Narendra Modi में गज़ब का आत्मविश्वास है| वह मुसीबतों से नहीं डरते और हमेशा प्रेरित एंव उत्साहित रहते है| आत्मविश्वास वहीँ होता है जहाँ किसी भी प्रकार का कोई “डर” नहीं होता|



सही समय पर सही निर्णय (Right Decision at Right Time):-

Modi की टाइमिंग गज़ब की है एंव वे प्रत्येक अपना प्रत्येक decision सही समय पर लेते है| Decision जितना महत्वपूर्ण होता है उसकी timing भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है| Narendra Modi ने शपथ समारोह में सभी देशों के प्रमुखों को बुलाकर सही टाइम पर सही decision लिया| मोदी ने हवाई वादे नहीं किये एंव उनकी सरकार के पहले बजट में भी इसी बात पर जोर दिया गया कि सबसे पहले अधूरी योजनाओं को पूरा किया जायेगा| मोदी निरंतर अपने सांसदों के साथ मीटिंग करते है एंव उन्हें ज्यादा से ज्यादा समय संसद में बिताने, काम पर ध्यान देने एंव फालतू बयानबाजी से बचने की सलाह देते है|

व्यवहारकुशलता एंव पहनावा :-

Modi की वाणी बुलंद है एंव उनके पास गज़ब की बोलने की कला है| Modi जब जनता के सामने बोलते है तो वे जनता की बात करते है और तेज आवाज से बोलते है एंव वे जब विदेशों के प्रमुखों के साथ बातचीत करते है तो बड़े आराम एंव शांतिपूर्ण तरीके के साथ बातचीत करते है|

Modi जहाँ भी जाते है वहां के हो जाते है| Modi जहाँ भी जाते है वहां की बात करते है, अगर वे राजस्थान जाते है तो राजस्थान की विशेषताओं की बात करते है एंव अगर वो नेपाल जाते है तो नेपाल की खूबसुरती की बात करते है| इसलिए उस क्षेत्र के लोगों को Modi अपने लगते है|

Modi अपने पहनावे पर विशेष ध्यान देते है एंव इसीलिए आज वे स्टाइल आइकॉन बन गए है एंव मार्केट में उनके स्टाइल के कपड़ों की विशेष डिमांड है|

सकारात्मक एंव आशावादी (positive thinking):-

Modi सकारात्मक सोच रखते है एंव आशावादी बनने की सलाह देते है| वे एक motivational गुरु की तरह बात करते है एंव दूसरों को प्रेरित करते रहते है| वे कार्य को सकारात्मक रूप से शुरू करते है एंव उसे पूरा करने के लिए जी जान लगा देते है| Modi आलोचनाओं की परवाह नहीं करते एंव आलोचनाओं को मुंह तोड़ जवाब देते है| प्रधानमंत्री बनने के बाद Modi ने अपने सांसदों को सलाह दी की फालतू के विवादों में न पड़ें एंव प्रत्येक आलोचना का जवाब न दें|

रचनात्मक सोच (Creative Thinking):-

Modi रचनात्मक रूप से सोचते है (Creative thinking) एंव रचनात्मकता को बढ़ावा देते है| वे हमेशा समस्याओं का समाधान, creative ideas के द्वारा करते है| उन्होंने www.mygov.nic.in website launch की ताकि वे जनता से सीधे जुड़ सकें एंव जनता के महत्वपूर्ण सुझाव उन्हें प्राप्त हो सके| Modi के चुनाव प्रचार का मुख्य साधन social media थी एंव यह उनकी creative thinking को दर्शाता है |



भारत की बात करते है (India First):-

Narendra Modi अपनी पार्टी से ज्यादा भारत (India First) की बात करते है जो उन्हें अन्य पार्टियों के नेताओं से अलग बनाता है| नरेन्द्र मोदी जानते है कि अगर भारत मजबूत हुआ तो उनकी पार्टी स्वत: मजबूत हो जाएगी, लेकिन अन्य पार्टियों ने इस बात को नहीं समझा और उन्हें इसका खामियाजा लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ा| नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी को इस तरह से पेश किया है कि जनता के सामने उनसे अच्छा कोई विकल्प नहीं रहा |



परिवर्तन को अपनाते है :-

अगर इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी की तुलना करें तो उनमे सबसे बड़ा फर्क यह है कि कांग्रेस ने अपना वही पुराना तरीका अपनाया एंव जनता की

Sachin Tendulkar के 5 सबक


Sachin Tendulkar के 5 सबक




Sachin Ramesh Tendulkar



Sachin एक  ऐसे  महान  खिलाड़ी   हैं , जिनके  जीवन  से  हम   बहुत  कुछ  सीख  सकते  हैं . और   आज  मैं  आपके  साथ  ऐसी  ही 5 बातें  शेयर  कर  रहा  हूँ  जिसे  हम  कह  सकते हैं :

Sachin Tendulkar के  5 सबक

1) बड़ा  सोचिये :

सचिन  जब  भारतीय  टीम  का  हिस्सा  नहीं  थे  तभी  से  वे  लगातार   भारत  के  लिए खेलने  का  सपना  देखते  थे . किसी  भी  cricketer के  लिए  यही  सबसे  बड़ी  बात  हो सकती है  कि  वो  देश  के  लिए  खेले  और  उसे  जीत दिलाये . हमें  भी  अपने -अपने  interest की  field में  जो  सबसे  बड़ा  हो  सकता  है  वो  करने की सोचनी  चाहिए   और  उसे  पाने  के  लिए  जी -तोड़  मेहनत   करनी  चाहिए .

2) संतोष  मत  करिये :

Sachin आज  तक  इतने  record बना  चुके  हैं  कि  उनकी  अलग  से  एक  record बुक  बनायीं  जा  सकती  है . सचिन  रनो  के  अम्बार  पर  खड़े  होकर  भी  हमेशा  रनो  के  लिए  भूखे  दिखे , उन्होंने  कभी  संतोष  नहीं  किया  और  दिन  प्रतिदिन  नए  records बनाते  चले  गए .

Friends, ज्यादातर  लोग  कुछ  बड़ा  achieve करने  के  बाद  satisfy हो  जाते  हैं  कि  चलो  मैंने  इतना  बड़ा काम कर लिया , पर  अगर  Sachin से  सीख  ली  जाए  तो  हमें  खुद  को  और  stretch करना  चाहिए  और  अपनी  क्षमता  को  बढ़ाते  हुए  नयी  उपलब्धियां  हासिल  करनी  चाहिए .

3) अपना  Focus  बनाये  रखिये :

Sachin ने  लगातार  24 सालों  तक  international level पे  cricket खेली  है . ये  करना  बिना  100% focus के  असम्भव  है . Sachin media की  आँखों  का  तारा  होने  के  बावजूद  कभी  cricket से  भटके  नहीं . कभी  उन्हें  फिल्मों  में  काम  करने के   तो  कभी  राजनीति  में  आने  के  offer मिले  पर  Sachin clear थे……  चौबीस  साल  से  उनका  focus बाइस  गज  की  pitch पर  ही  था  और  इसलिए  वे  सर पर उम्मीदों का पहाड़ होते हुए भी किसी  और cricketer से  कहीं  अधिक  लम्बे  समय  तक  और  बेहतर  खेल  पाये .

अगर हम भी  कुछ  बड़ा  करना  चाहते  हैं  तो  हमें भी अपना   focus किसी  एक  चीज  पर  लम्बे   समय  तक बनाये  रखना  होगा।

4) Bounce back कीजिये :

हर  खिलाडी  या  व्यक्ति  के  जीवन  में  बुरा  दौर  आता  है , Sachin भी  कई  बार  out of form हुए  हैं , तो  कभी  किसी  चोट  की  वजह  से  team से  बाहर  बैठे  हैं .  पर  हर  बार  उन्होंने  bounce back किया  है .

मुझे  याद  है  Jan 2006 में  Times of India में  बड़ी  सी  headline आयी  थी….

ENDULKAR….  जिसका  मतलब  था  Sachin’s career is over…पर  उसी   paper को   24 Feb 2012 को  एक  नयी  headline देनी  पड़ी …..

Sachin becomes first batsman to score 200 in an ODI  …. ऐसे  हैं  हमारे  master-blaster….

हमें  क्रिकेट  के  इस  भगवान्  से  सीख  लेनी  चाहिए ,कितनी  ही  बार  हमारी  life में  problems आती  हैं  और  हम  उनके  सामने  घुटने  टेकने को  तैयार  हो  जाते  हैं  … let’s not do that…Sachin से  सीख  लेते  हुए  हमें  भी  तमाम  मुश्किलों  के  बावजूद  हर  बार  बाउंस – बैक   करना  चाहिए   और  अपने  लक्ष्य  को प्राप्त  करना  चाहिए .

5) कभी  घमंड  मत  करिये  :

मैं  एक  video देख  रहा  था , “ bhagwan zameen par”, उसमे  एक  बड़ी  मजेदार  बात  कही  गयी  थी …. “Sachin ने  इतने records बनाने  के  बाद  भी  कभी इतना  attitude  show  नहीं  किया जितना लोग  उनके records  याद  कर  के  show करते  हैं .”

Sachin इतना  कुछ  achieve कर  चुके  हैं  फिर  भी  वो  next door guy ही लगते  हैं . ये  आसान  नहीं  है , और भी नहीं जब लोग आपको इंसान से भगवन बना दें…और लोग ही क्यों सचिन की तो उनके साथी खिलाड़ी भी तारीफ़ करते नहीं थकते

दुनिया के टॉप अमीर लोग जिनके पास कोई डिग्री नहीं है


दुनिया के टॉप अमीर लोग जिनके पास
कोई डिग्री नहीं है
जो लोग सपने देखने की हिम्मत रखते हैं वही
लोग अपने सपने साकार करते हैं। दोस्तों
दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने
अपनी पढाई को बीच में ही छोड़ दिया
लेकिन आगे चलकर वो दुनियाँ के सबसे अमीर
और सफल लोगों में जाने गए। सफलता केवल
अक्षरज्ञान का नाम नहीं है। सफलता के
लिए इंसान के अंदर जूनून और आगे बढ़ने की भूख
होनी चाहिए। दुनिया का कोई लक्ष्य
असंभव नहीं है। आज हम इस लेख में ऐसे ही
लोगों के बारे में जानेंगे जिनके पास कोई
डिग्री नहीं थी लेकिन फिर भी वो लोग
सफल हुए और एक असाधारण उदहारण पेश
किया-
DUNIYA KE AMEER LOG WITHOUT COLLEGE
DEGREE
Bill Gates
बिल गेट्स(Bill Gates) – माइक्रोसॉफ्ट
कम्पनी के लिए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की
पढाई बीच में छोड़ी| बिल गेट्स को बचपन
से ही कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग का शौक था।
मात्र 13 वर्ष की आयु में उन्होंने बड़े बड़े
सॉफ्टवेयर बनाने शुरू कर दिए थे। यही नहीं
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने के
पाँच साल पहले से ही बिल प्रोग्रामिंग
एक्सपर्ट थे। 1975 में बिल गेट्स ने अपनी पढाई
बीच में छोड़ दी और अपने मित्र पॉल एलन के
साथ माइक्रोसॉफ्ट को आगे बढ़ाने में जुट
गए। बिल गेट्स आज दुनिया के सबसे अमीर
लोगों में शुमार हैं।
Oprah Winfrey
Oprah Winfrey – ओपराह विनफ्रे को शुरुआत से
ही मीडिया में बहुत अधिक रूचि थी।
स्कूल में स्टेज पे भाषण देना और अन्य
मिडिया सम्बंधित चीज़ें विनफ्रे की फेवरेट
थीं। कुछ टाइम उन्होंने लोकल रेडियो
स्टेशन में नौकरी भी की थी। जब ये
Tennessee State University में थीं तब इनको
मीडिया में अच्छी नौकरी मिली और
इन्होंने अपनी पढाई को छोड़कर मीडिया
में करियर पर ध्यान दिया। आज विनफ्रे
विश्व की सफलतम लोगों में गिनी जाती
हैं।
Michael Dell
Michael Dell – माइकल डैल ने मात्र 19 वर्ष
की अवस्था में ही कॉलेज बीच में छोड़
दिया था। इन्होने डैल कम्प्यूटर कम्पनी की
स्थापना की। 1992, में माइकल को वर्ल्ड
का सबसे youngest CEO घोषित किया गया
था। माइकल ने $1,000 डॉलर के साथ ही
अपने बिजनिस की शुरुआत की थी और आज
Dell Inc. दुनियाँ की टॉप कम्प्यूटर बनाने
वाली कम्पनियों में से एक है।
Steve Jobs
Steve Jobs – स्टीव जॉब्स वो शख्स हैं जो
लाखों युवाओं के लिए आइडियल
पर्सनालिटी हैं। स्टीव ने भी अपनी
कॉलेज की पढाई बीच में छोड़ दी थी और
1975 में “एप्पल” कम्पनी की स्थापना की।
स्टीव ने Reed College से मात्र एक सेमेस्टर के
बाद पढाई छोड़ दी थी लेकिन उनके अंदर
बहुत लगन और आगे बढ़ने का जुनून था, जिसके
दम पे स्टीव जॉब्स ने पूरी दुनियाँ में अपना
नाम कर दिया।
Matt Mullenweg
Matt Mullenweg – मुलेनवेग ने 2004 में University
of Houston से अपनी पढाई अधूरी छोड़ दी
थी। आपको यकीन नहीं होगा मात्र 20
वर्ष की आयु में उन्होंने WordPress जैसा बड़ा
सॉफ्टवेयर बना लिया था। और वह
प्रोग्रामिंग फिल्ड में ही नौकरी तलाश
रहे थे, लेकिन अच्छी नौकरी ना मिलने के
कारण उन्होंने अपने अपने WordPress को ही
आगे बढ़ाने का सोचा और खुद की कम्पनी
की स्थापना की और आज दुनियाँ की
करीब 23% वेबसाइट WordPress में ही बनी हैं।
Mark Zuckerberg
Mark Zuckerberg – मार्क जुकरबर्ग के बारे में
शायद किसी को कुछ कहने की आवश्यकता
नहीं है। जुकरबर्ग मेरे आइडियल पर्सन हैं मैं
हमेशा से उनके जैसा बनना चाहता हूँ। 2004
में जुकरबर्ग ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से
अपनी पढाई अधूरी छोड़ दी थी और फेसबुक
को बनाया जो आज करोड़ों नहीं अरबों
लोगों की फेवरेट वेबसाइट है जिसने सोशल
मीडिया को एक नया बूम दिया। आज
मार्क दुनियाँ के टॉप अमीरों में गिने जाते
हैं।
Larry Elllison
Larry Ellison – एलिसन के बारे में मजेदार बात
यह है कि ये दो बार अपना कॉलेज पढाई
छोड़ चुके हैं। पहले University of Illinois से 2
साल की पढाई के बाद कॉलेज बीच में छोड़
दिया, बाद में इन्होने University of Chicago में
एडमिशन लिया और वहाँ से भी मात्र 1
सेमस्टर के बाद पढाई छोड़ दी। बाद में
इन्होंने जाने माने डेटाबेस सॉफ्टवेयर Oracle
का निर्माण किया जो आज सबसे ज्यादा
use किया जाने वाला डेटाबेस है और
Oracle आज दुनियाँ की टॉप प्रतिष्ठित
कम्पनियों में जानी जाती है।
तो दोस्तों केवल डिग्री होना ही
काफी नहीं है। अपने इंटरेस्ट के हिसाब से
काम करिये। वो काम करिये जिसमें
आपकी रूचि हो फिर काम सिर्फ काम ना
रहकर एक खेल बन जायेगा। अपने अंदर के
आत्मविश्वास को जगाइए और मेहनत के
साथ जुट जाइये, बहुत जल्दी आपका नाम
भी इन्हीं लोगों की श्रेणी में होगा।
धन्यवाद!!!

Sunday 13 December 2015

माधोसिंह भंडारी गढ़वाल की कथाओं का अहम अंग


पहाड़ को काटकर अपने गांव में सड़क बनाने वाले
दशरथ मांझी आजकल एक फिल्म के कारण चर्चा में
हैं। लेकिन क्या आप माधोसिंह भंडारी को जानते
हैं, जो आज से लगभग 400 साल पहले पहाड़ का सीना
चीरकर नदी का पानी अपने गांव लेकर आये थे। गांव
में नहर लाने के उनके प्रयास की यह कहानी भी
काफी हद तक दशरथ मांझी से मिलती जुलती है।
माधोसिंह भंडारी गढ़वाल की कथाओं का अहम अंग
रहे हैं।
आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस महान योद्धा के
बारे में। योद्धा इसलिए, क्योंकि वह माधोसिंह थे
कि जिन्होंने ति​ब्बतियों को उनके घर में जाकर
छठी का दूध याद दिलाया था तथा भारत और
तिब्बत (अब चीन) के बीच सीमा रेखा तय की थी।
गढ़वाल के इस महान सेनापति, योद्धा और कुशल
इंजीनियर माधोसिंह भंडारी के बारे में गढ़वाल में
यह छंद काफी प्रसिद्ध है....
एक सिंह रैंदो बण, एक सिंह गाय का।
एक सिंह माधोसिंह, और सिंह काहे का।।
(यानि एक सिंह वन में रहता है, एक सींग गाय का
होता है। एक सिंह माधोसिंह है। इसके अलावा
बाकी कोई सिंह नहीं है।)
माधोसिंह के बारे में अपने ब्लॉग 'घसेरी' में विस्तार
से चर्चा करने वाले वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र मोहन पंत
कहते हैं कि माधोसिंह का जन्म मलेथा गांव में हुआ
था। (कुछ कहानियों में यह भी कहा गया है कि
उनकी बहन का विवाह इस गांव में हुआ था, जबकि
एक किस्सा यह भी कहता है कि मलेथा उनकी
ससुराल थी)। मलेथा गांव देवप्रयाग और श्रीनगर के
बीच में बसा हुआ है। यह सत्रहवीं सदी के शुरुआती
वर्षों यानि 1600 के बाद की बात है, जब
माधोसिंह का बचपन मलेथा गांव में बीता होगा।
उनके पिता का नाम कालो भंडारी था जो स्वयं
वीर पुरुष थे। यह कह सकते हैं कि माधोसिंह की रगों
में एक योद्धा का खून ही दौड़ रहा था।
शुरुआत करते हैं कालो भंडारी से। यह सम्राट अकबर के
जमाने की बात है। कहा जाता है कि अकबर, कुमांऊ
में चंपावत के राजा गरूड़ ज्ञानचंद और सिरमौर के
राजा मौलीचंद की तपोवन के आसपास स्थित
उपजाऊ भूमि को लेकर गढ़वाल के राजा मानशाह
(1591 से 1610) से ठन गयी थी। ये तीनों इस भूमि में
अपना हिस्सा चाहते थे। राजा मानशाह ने उनका
आग्रह ठुकरा दिया। दिल्ली दरबार और चंपावत को
उनका यह फैसला नागवार गुजरा। दोनों ने युद्धकला
में निपुण अपने दो-दो सिपहसालारों को वहां भेज
दिया। राजा मानशाह ने कालो भंडारी से मदद
मांगी, जिन्होंने अकेले ही इन चारों को परास्त
किया था। तब राजा ने कालो भंडारी को सौण
बाण (स्वर्णिम विजेता) उपाधि दी थी और तब से
उनका नाम सौण बाण कालो भंडारी पड़ गया था।
अब वापस लौटते हैं माधोसिंह भंडारी पर। वह
गढ़वाल के राजा महीपत शाह के तीन बहादुर
सेनापतियों में से एक थे, लेकिन इन तीनों
(माधोसिंह के अलावा रिखोला लोदी और
बनवारी दास) में माधोसिंह ही ऐसे थे, जिन्हें
गढ़वाल और कुमांऊ के योद्धाओं में विशिष्ट स्थान
प्राप्त है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार माधोसिंह
ने कुछ समय रानी कर्णावती के साथ भी काम
किया था।
कहा जाता है कि एक बार जब वह श्रीनगर दरबार से
लगभग पांच मील की दूरी पर स्थित अपने गांव पहुंचे
तो उन्हें काफी भूख लगी थी। उन्होंने अपनी पत्नी
(एक किस्से के अनुसार भाभी) से खाने देने को कहा
तो उन्हें केवल रूखा सूखा खाना दिया गया। जब
माधोसिंह ने कारण पूछा तो पत्नी ने ताना दिया
कि जब गांव में पानी ही नहीं है तो सब्जियां और
अनाज कैसे पैदा होगा? माधोसिंह को यह बात चुभ
गयी। रात भर उन्हें नींद नहीं आयी।
मलेथा के काफी नीचे अलकनंदा नदी बहती थी
जिसका पानी गांव में नहीं लाया जा सकता था।
गांव के दाहिनी तरफ छोटी नदी या गदना बहता
था जिसे चंद्रभागा नदी कहा जाता है। चंद्रभागा
का पानी भी गांव में नहीं लाया जा सकता था
क्योंकि बीच में पहाड़ था। माधोसिंह ने इसी पहाड़
के सीने में सुरंग बनाकर पानी गांव लाने की ठानी
थी। कहा जाता है कि उन्होंने श्रीनगर दरबार और
गांव वालों के सामने भी इसका प्रस्ताव रखा था
लेकिन दोनों जगह उनकी खिल्ली उड़ायी गयी थी।
आखिर में माधोसिंह अकेले ही सुरंग बनाने के लिये
निकल पड़े थे।
सुरंग बनी पर बेटे की जान गयी
माधोसिंह शुरू में अकेले ही सुरंग खोदते रहे, लेकिन
बाद में गांव के लोग भी उनके साथ जुड़ गये। कहा
जाता है कि सुरंग खोदने में लगे लोगों का जोश
बनाये रखने के लिये तब गांव की महिलाएं शौर्य रस
से भरे गीत गाया करती थी। माधोसिंह की मेहनत
आखिर में रंग लायी और सुरंग बनकर तैयार हो गयी।
यह सुरंग आज भी इंजीनियरिंग का अद्भुत नमूना है
और मलेथा गांव के लिये पानी का स्रोत है। इस सुरंग
से माधोसिंह के बेटे गजेसिंह का नाम भी जोड़ा
जाता है। इसको लेकर दो तरह की कहानियां हैं।
पहली कहानी के अनुसार माधोसिंह ने अपनी पत्नी
को सख्त हिदायत दे रखी थी कि वह गजेसिंह को
उस स्थल पर नहीं आने दे जहां सुरंग खोदी जा रही
थी। एक दिन जिद करके गजेसिंह वहां पहुंच


एक लडकी ने एक लडके का प्यार
कबूल नही किया तो लडके ने
लडकी के मुँह पर तेजाब फेक दिया
तो लडकी ने लडके से चंद पंक्तीयाँ
कही आप एक बार इन पंक्तीयो को
जरुर पढना
चलो,फेंक दिया सो फेंक दिया....
अब कसूर भी बता दो मेरा
तुम्हारा इजहार था
मेरा इन्कार था
बस इतनी सी बात पर
फूंक दिया तुमने
चेहरा मेरा....
गलती शायद मेरी थी
प्यार तुम्हारा देख न सकी
इतना पाक प्यार था
कि उसको मैं समझ ना सकी....
अब अपनी गलती मानती हूँ
क्या अब तुम ... अपनाओगे मुझको?
क्या अब अपना ... बनाओगे मुझको?
क्या अब ... सहलाओगे मेरे चहरे को?
जिन पर अब फफोले हैं...
मेरी आंखों में आंखें डालकर देखोगे?
जो अब अन्दर धस चुकी हैं
जिनकी पलकें सारी जल चुकी हैं
चलाओगे अपनी उंगलियाँ मेरे गालों पर?
जिन पर पड़े छालों से अब पानी निकलता है
हाँ, शायद तुम कर लोगे....
तुम्हारा प्यार तो सच्चा है ना?
अच्छा! एक बात तो बताओ
ये ख्याल 'तेजाब' का कहाँ से आया?
क्या किसी ने तुम्हें बताया?
या जेहन में तुम्हारे खुद ही आया?
अब कैसा महसूस करते हो
तुम मुझे जलाकर?
गौरान्वित..???
या पहले से ज्यादा
और भी मर्दाना...???
तुम्हें पता है
सिर्फ मेरा चेहरा जला है
जिस्म अभी पूरा बाकी है
एक सलाह दूँ!...
एक तेजाब का तालाब बनवाओ
फिर इसमें मुझसे छलाँग लगवाओ
जब पूरी जल जाऊँगी मैं
फिर शायद तुम्हारा प्यार मुझमें
और गहरा और सच्चा होगा....
एक दुआ है....
अगले जन्म में
मैं तुम्हारी बेटी बनूँ
और मुझे तुम जैसा
आशिक फिर मिले
शायद तुम फिर समझ पाओगे
तुम्हारी इस हरकत से
मुझे और मेरे परिवार को
कितना दर्द सहना पड़ा है।...
तुमने मेरा पूरा जीवन
बर्बाद कर दिया है
(शेयर कर देना)
दोस्तो एक बार.
आप सभी से एक बात कहता हूँ
अगर किसी से सच्चे दिल से प्यार
करते हो तो प्लीज उसकी लाईफ
बर्बाद मत करना और ना ही कुछ
ऐसा करना जो आप अपनी बहन के
साथ होता हुआ भी नही देख सकते
सच्चा प्यार वही होता है जो बिछडने
के बाद भी उसकी खुशी में खुश रहे
और उसका सम्मान कर
Y

kalyug ka sachPicture: गहरी बात लिख दी है किसी शक्शियत नें 👌👌👌👉 बेजुबान पत्थर पे लदे है करोडो के गहने मंदिरो में । उसी देहलीज पे एक रूपये को तरसते नन्हे हाथो को देखा है। सजे थे छप्पन भोग और मेवे मूरत के आगे । बाहर एक फ़कीर को भूख से तड़प के मरते देखा है ।। लदी हुई है रेशमी चादरों से वो हरी मजार ,पर बहार एक बूढ़ी अम्मा को ठंड से ठिठुरते देखा है। वो दे आया एक लाख गुरद्वारे में हॉल के लिए , घर में उसको 500 रूपये के लिए काम वाली बाई बदलते देखा है। सुना है चढ़ा था सलीब पे कोई दुनिया का दर्द मिटाने को, आज चर्च में बेटे की मार से बिलखते माँ बाप को देखा है। जलाती रही जो अखन्ड ज्योति देसी घी की दिन रात पुजारन , आज उसे प्रसव में कुपोषण के कारण मौत से लड़ते देखा है । जिसने न दी माँ बाप को भर पेट रोटी कभी जीते जी , आज लगाते उसको भंडारे मरने के बाद देखा । दे के समाज की दुहाई ब्याह दिया था जिस बेटी को जबरन बाप ने, आज पीटते उसी शौहर के हाथो सरे राह देखा है । मारा गया वो पंडित बेमौत सड़क दुर्घटना में यारो , जिसे खुदको काल सर्प,तारे और हाथ की लकीरो का माहिर लिखते देखा है जिस घर की एकता की देता था जमाना कभी मिसाल दोस्तों , आज उसी आँगन में खिंचती दीवार को देखा है। बंद कर दिया सांपों को सपेरे ने यह कहकर, अब इंसान ही इंसान को डसने के काम आएगा। ************* आत्महत्या कर ली गिरगिट ने सुसाइड नोट छोडकर, अब इंसान से ज्यादा मैं रंग नहीं बदल सकता। ************ गिद्ध भी कहीं चले गए लगता है उन्होंने देख लिया कि,इंसान हमसे अच्छा नोंचता है। ************ कुत्ते कोमा में चले गए,ये देखकर, क्या मस्त तलवे चाटते हुए इंसान देखा है । इस कविता को मैने आप तक पहुंचाने मे र्सिफ उंगली का उपयोग किया है! और रचियता को सादर नमन 🙏🙏🙏 ं किया है. - गहरी बात लिख दी है किसी शक्शियत नें 👌👌👌




Uttarakhand Great Martyr "Shri Dev Suman"' Sri Dev Suman' (25 May 1916 – 25 July 1944) was a freedom fighter from Tehri District of Uttarakhand. He was born at Jaul village patti Bamund of Tehri Garhwal . His father was a doctor and his mother a housewife. When the whole of India was fighting for freedom from the British government, Suman was fighting for the freedom of Tehri Riyasat from the King of Garhwal . He was a great fan of Gandhi and used the nonviolence way for the freedom of Tehri. Environment leader Sunderlal Bahuguna was also with Shri Dev Suman. [1] During his fight with the King of Tehri who called as Bolanda Badri (speaking Badrinath), he demand complete freedom for the Tehri. On 30 December 1943 he was declared a rebel and arrested by Tehri kingdom. In jail, Suman was tortured, very heavy cuffs was given to him, pieces of stone were mixed with his food, sand mixed roti was given to him, and many more tortures were applied by the jailer Mohan Singh and other staff. Then he decided to go on hunger strike . Jail staff tried to give him food and water forcibly, with no success. After being in prison for 209 days, and on hunger strike for 84 days, Shri Dev Suman died[2] on 25 July 1944. His dead body was thrown into the Bhilangna River without a funeral.' Sri Dev Suman' (25 May 1916 – 25 July 1944) was a freedom fighter from Tehri District of Uttarakhand. He was born at Jaul village patti Bamund of Tehri Garhwal . His father was a doctor and his mother a housewife. When the whole of India was fighting for freedom from the British government, Suman was fighting for the freedom of Tehri Riyasat from the King of Garhwal . He was a great fan of Gandhi and used the nonviolence way for the freedom of Tehri. Environment leader Sunderlal Bahuguna was also with Shri Dev Suman. [1] During his fight with the King of Tehri who called as Bolanda Badri (speaking Badrinath), he demand complete freedom for the Tehri. On 30 December 1943 he was declared a rebel and arrested by Tehri kingdom. In jail, Suman was tortured, very heavy cuffs was given to him, pieces of stone were mixed with his food, sand mixed roti was given to him, and many more tortures were applied by the jailer Mohan Singh and other staff. Then he decided to go on hunger strike . Jail staff tried to give him food and water forcibly, with no success. After being in prison for 209 days, and on hunger strike for 84 days, Shri Dev Suman died[2] on 25 July 1944. His dead body was thrown into the Bhilangna River without a funeral.

उत्तराखण्ड (पूर्व नाम उत्तरांचल ), उत्तर भारत में स्थित एक राज्य है जिसका निर्माण ९ नवम्बर २००० को कई वर्षों के आन्दोलन के पश्चात[3] भारत गणराज्य के सत्ताइसवें राज्य के रूप में किया गया था। सन २००० से २००६ तक यह उत्तराञ्चल के नाम से जाना जाता था। जनवरी २००७ में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य का आधिकारिक नाम बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया। [4] राज्य की सीमाएँ उत्तर में तिब्बत और पूर्व में नेपाल से लगी हैं। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तर प्रदेश इसकी सीमा से लगे राज्य हैं। सन २००० में अपने गठन से पूर्व यह उत्तर प्रदेश का एक भाग था। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों और प्राचीन साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप में किया गया है। हिन्दी और संस्कृत में उत्तराखण्ड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है। राज्य में हिन्दू धर्म की पवित्रतम और भारत की सबसे बड़ी नदियों गंगा और यमुना के उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री और यमुनोत्री तथा इनके तटों पर बसे वैदिक संस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं। देहरादून, उत्तराखण्ड की अन्तरिम राजधानी होने के साथ इस राज्य का सबसे बड़ा नगर है। गैरसैण नामक एक छोटे से कस्बे को इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भविष्य की राजधानी के रूप में प्रस्तावित किया गया है किन्तु विवादों और संसाधनों के अभाव के चलते अभी भी देहरादून अस्थाई राजधानी बना हुआ है। [5][6] राज्य का उच्च न्यायालय नैनीताल में है। राज्य सरकार ने हाल ही में हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये कुछ पहल की हैं। साथ ही बढ़ते पर्यटन व्यापार तथा उच्च तकनीकी वाले उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए आकर्षक कर योजनायें प्रस्तुत की हैं। राज्य में कुछ विवादास्पद किन्तु वृहत बाँध परियोजनाएँ भी हैं जिनकी पूरे देश में कई बार आलोचनाएँ भी की जाती रही हैं, जिनमें विशेष है भागीरथी-भीलांगना नदियों पर बनने वाली टिहरी बाँध परियोजना । इस परियोजना की कल्पना १९५३ मे की गई थी और यह अन्ततः २००७ में बनकर तैयार हुआ। उत्तराखण्ड, चिपको आन्दोलन के जन्मस्थान के नाम से भी जाना जाता है। [7] इतिहास मुख्य लेख : उत्तराखण्ड का इतिहास यह भी पढ़ें: उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन, रामपुर तिराहा गोली काण्ड , श्रीनगर, गढ़वाल का इतिहास, उत्तराखंड में स्वाधीनता संग्राम स्कन्द पुराण में हिमालय को पाँच भौगोलिक क्षेत्रों में विभक्त किया गया है:- “ खण्डाः पञ्च हिमालयस्य कथिताः नैपालकूमाँचंलौ। केदारोऽथ जालन्धरोऽथ रूचिर काश्मीर संज्ञोऽन्तिमः॥ ” अर्थात हिमालय क्षेत्र में नेपाल, कुर्मांचल ( कुमाऊँ ), केदारखण्ड ( गढ़वाल), जालन्धर ( हिमाचल प्रदेश ) और सुरम्य कश्मीर पाँच खण्ड है। [8] पौराणिक ग्रन्थों में कुर्मांचल क्षेत्र मानसखण्ड के नाम से प्रसिद्व था। पौराणिक ग्रन्थों में उत्तरी हिमालय में सिद्ध गन्धर्व , यक्ष , किन्नर जातियों की सृष्टि और इस सृष्टि का राजा कुबेर बताया गया हैं। कुबेर की राजधानी अलकापुरी ( बद्रीनाथ से ऊपर) बताई जाती है। पुराणों के अनुसार राजा कुबेर के राज्य में आश्रम में ऋषि-मुनि तप व साधना करते थे। अंग्रेज़ इतिहासकारों के अनुसार हुण, सकास, नाग, खश आदि जातियाँ भी हिमालय क्षेत्र में निवास करती थी। पौराणिक ग्रन्थों में केदार खण्ड व मानस खण्ड के नाम से इस क्षेत्र का व्यापक उल्लेख है। इस क्षेत्र को देव- भूमि व तपोभूमि माना गया है। मानस खण्ड का कुर्मांचल व कुमाऊँ नाम चन्द राजाओं के शासन काल में प्रचलित हुआ। कुर्मांचल पर चन्द राजाओं का शासन कत्यूरियों के बाद प्रारम्भ होकर सन १७९० तक रहा। सन १७९० में नेपाल की गोरखा सेना ने कुमाऊँ पर आक्रमण कर कुमाऊँ राज्य को अपने आधीन कर लिया। गोरखाओं का कुमाऊँ पर सन १७९० से १८१५ तक शासन रहा। सन १८१५ में अंग्रेंजो से अन्तिम बार परास्त होने के उपरान्त गोरखा सेना नेपाल वापस चली गई किन्तु अंग्रेजों ने कुमाऊँ का शासन चन्द राजाओं को न देकर ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधीन कर दिया। इस प्रकार कुमाऊँ पर अंग्रेजो का शासन १८१५ से आरम्भ हुआ। संयुक्त प्रांत का भाग उत्तराखण्ड, १९०३ ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार केदार खण्ड कई गढ़ों (किले) में विभक्त था। इन गढ़ों के अलग-अलग राजा थे जिनका अपना-अपना आधिपत्य क्षेत्र था। इतिहासकारों के अनुसार पँवार वंश के राजा ने इन गढ़ों को अपने अधीनकर एकीकृत गढ़वाल राज्य की स्थापना की और श्रीनगर को अपनी राजधानी बनाया। केदार खण्ड का गढ़वाल नाम तभी प्रचलित हुआ। सन १८०३ में नेपाल की गोरखा सेना ने गढ़वाल राज्य पर आक्रमण कर अपने अधीन कर लिया। यह आक्रमण लोकजन में गोरखाली के नाम से प्रसिद्ध है। महाराजा गढ़वाल ने नेपाल की गोरखा सेना के अधिपत्य से राज्य को मुक्त कराने के लिए अंग्रेजो से सहायता मांगी। अंग्रेज़ सेना